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Showing posts from July, 2008

हिस्सा प्यार का....

Hi Frenz....
again am with one more pice of my poetry ....
which again has pain in it....
now dont havev questions as to why i am all in such a patho mood....
well, my poems dont go along just with my emotions or feelings :D



हर गली, हर राह में बातें तेरे मेरे हैं ,
पलकों के पनघट पे यादें सुनहरे हैं !
अब तक आँखों में झलका था प्यार ...
बिन बताये बह गया आँखों के पार !

कल, आज कल.......

I dont think any explaination is needed for this... the words says it all.....



कल तलक़ आँखों में था प्यार हरा
आज कल आँसू हैं प्यालों में भरा

आपके होन्ट थे चूमे जिसको,
आज हैं आँसू चूमे इन गालों को

लेके जिस प्यार को, जगाया था रातों को
दिल जले हम हैं चले डूंड उन वादों को

एक कदम चल ना सके थे हम सूनी राहों में
आज उसीको पार चले खोए अपने सवालों में

प्यार से ज़्यादा क्या था मंज़िल कोई,
जिसके लिए दे कर गये यूँ तन्हाई....